Mugal Samrajya ke wighatan ke Karan: मुगल साम्राज्य के विघटन के कारण

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Mugal Samrajya ke wighatan ke Karan: मुगल साम्राज्य के विघटन के कारण

 

Mugal Samrajya ke wighatan ke Karan
Mugal Samrajya ke wighatan ke Karan

 

  • कुछ इतिहासकारों का मानना है कि 18वीं शताब्दी के मध्य में भारतीय अर्थव्यवस्थ में तीव्र गिरावट के कारण मुगल साम्राज्य का पतन हुआ। यह सत्य है कि साम्राज्य

के कई हिस्सों में अलग-अलग समय में अराजकता एवं युद्ध हुए, वित्तीय विपदा को जन्म दिया। केंद्रीय शासन ने अपनी शक्ति खो दी, जिस दिल्ली के पतन को प्रवृत्त किया। लोगों ने प्रांतों की ओर प्रस्थान किया, ने अपनी प्राथमिकता खो दी, और कलाकार आजीविका प्राप्ति के लिए अन्य स्थानों की ओर गमन कर गए। इसी प्रकार की स्थिति आगरा एवं अवध की थी। सिख विद्रोह ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया, जिन्होंने लाहौर एवं

अन्य स्थानों के व्यापारिक मार्गों को अवरुद्ध कर दिया। सामान्य तौर पर, 18वें शताब्दी के मध्य तक उत्तरी-पश्चिमी भारत के समृद्ध शहरी केंद्र अपक्षय की स्थिति में आ चुके थे। बंगाल, बिहार और उड़ीसा के पूर्वी प्रांतों में, मराठाओं के आकस्मिक हमलों ने विनाशकारी युद्ध को बढ़ावा दिया। मुगल साम्राज्य के विघटन की प्रक्रिया औरंगजेब के शासनकाल के दौरान शुरू

हो चुकी थी, लेकिन इसमें तीव्रता 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात ही आई। यहां तक कि परिस्थितियां इतनी भी शोचनीय या चिंताजनक नहीं थीं कि प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता था। यद्यपि कई प्रांतीय मुखियाओं और शासको द्वारा मुगल सत्ता के समक्ष चुनौती प्रस्तुत की गई, तथापि कोई भी मुगल के समक्ष स्वतंत्रता प्राप्त नहीं कर सका। सिख, मराठा और राजपूत इतनी क्षमता

हासिल नहीं कर सके कि मुगल साम्राज्य को उखाड़ फेंक सकें। उन्होंने मुगल शक्ति का मात्र उतना विरोध किया, जिससे वे अपने संबद्ध क्षेत्र में स्वतंत्र हासिल कर सकें। इस प्रकार, यदि औरंगजेब के उत्तराधिकारी सक्षम एवं योग्ग शासक होते, तो मुगल सत्ता का पतन नहीं होता। मध्यकालीन युग में, साम्राज का भविष्य शासक की क्षमताओं पर निर्भर होता था। औरंगजेब के उत्तराधिकार प्रक्रिया को तीव्र किया, और अंततः इसे धूल-धूसरित करने में योगदान दिया।

  • Mugal Samrajya ke wighatan ke Karan:

    दो वर्गों द्वारा राज्य शक्ति में हिस्सेदारी

मध्यकालीन युग के दौरान दो वर्गों-जमींदार और कुलीन वर्ग-द्वारा शासकके साथ राज्य शक्ति में हिस्सेदारी की गई। जमींदार अपनी जमीन के वंशानुगतस्वामी थे, जिन्हें वंशानुगत आधार पर कुछ विशेषाधिकार प्राप्त थे; इन्हें राय, राजस, ठाकुर, खुत और देशमुख जैसे विभिन्न नामों से जाना जाता था। राजस्व संग्रहण में मदद और स्थानीय प्रशासन के लिए सैनिकों का प्रबंध करने के कारण जमींदारों को साम्राज्य में मुख्य स्थान प्राप्त था। यद्यपि मुगलों ने जमींदारों की शक्ति को नियंत्रित करने का प्रयास किया और किसानों से सीधा संपर्क साधने

की व्यवस्था की, जिसमें वे पूरी तरह सफल नहीं हो पाए। स्वयं औरंगजेब के शासनकाल के दौरान, उनकी शक्ति एवं प्रभाव में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इसका बड़ा नतीजा यह हुआ कि क्षेत्रीय निष्ठा को प्रोत्साहित किया गया। कई स्थानीय जमींदारों ने साम्राज्य के भीतर अन्य शक्तिशाली वर्गों की सहायता की। इसी प्रकार एक अन्य कुलीन वर्ग था; इसमें ऐसे लोग थे, जिन्हें बड़ी जागी

और मनसब सौंपे जाते थे या जिन्हें मुगल सूबों का सूबेदार नियुक्त करके उनके प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी। इस वर्ग में कई राजपूत शासक, सूबेदार और मनसबदार शामिल थे। मुगल शासन को अकसर ‘कुलीन वर्ग के शासन’ के तौ मुगल

पर भी परिभाषित किया जाता था, क्योंकि साम्राज्य को प्रशासित करने में कुलीनों ने एक केंद्रीय भूमिका निभाई। औरंगजेब के बाद के मुगल शासकों के शासनकाल के दौरान विभिन्न समूहों के बीच बढ़ती पारस्परिक शत्रुता, ईर्ष्या एवं शक्ति प्राप्ति की प्रतिस्पर्धा ने न केवल शासकों की प्रतिष्ठा को घटाया, अपित मुगल शक्ति के पतन में भी एक अहम भूमिका निभाई।

 

  • Mugal Samrajya ke wighatan ke Karan

    विभिन्न क्षेत्रीय शक्तिशाली समूहों का उद्गम

औरंगजेब के शासनकाल में जाट, सिख और मराठा जैसे शक्तिशाली क्षेत्रीय समूहों का पदार्पण हुआ, जिन्होंने स्वयं के राज्य बनाने हेतु मुगल साम्राज्य से युद्ध शुरू कर दिया था। तब वे अपने प्रयास में सफल नहीं हुए, लेकिन उनमें सेप्रत्येक ने अपने संबद्ध क्षेत्रों में राजनीतिक घटनाक्रमों के भविष्य का मार्ग तैयार किया। राजनीतिक बढ़त के लिए, मुगल शासन से उनके निरंतर संघर्ष ने मुगल सत्ता को महत्वपूर्ण रूप से कमजोर किया। औरंगजेब और उनके पश्चात बहादुर शाह ने, राजपूतों के दमन के प्रयास द्वारा मुगलों के खिलाफ निरंतर युद्ध कस के लिए उन्हें उकसाया।

 

औरंगजेब के पश्चातवती मुगल शासकों ने राजपूतों के साथ समझौते की नीति अपनाने का प्रयास किया, लेकिन तब तक काफी देर ह चुकी थी। राजपूतों ने साम्राज्य के विकास एवं कल्याण के लिए मुगलों के साथ गठबंधन करने पर विश्वास नहीं किया।  मराठा भी मुगलों के लिए दुर्जेय शत्रु सिद्ध हुए। शुरुआत में उनका लक्ष्य केवलमहाराष्ट्र पर नियंत्रण हासिल करने तक सीमित था, जिसमें आगे चलकर मुगल शासक से पूरे भारत में सरदेशमुखी, और चौथ वसूलने की अनुमति प्राप्त करना भी शामिल हो गया। 1740 तक मराठा उत्तर भारत में प्रवेश कर गए, और गुजरात, मालवा तथा बुंदेलखंड प्रांतों पर अपना प्रभाव स्थापित करने में सफल हो गए। इस प्रकार, मुगल साम्राज्य के विरुद्ध राजपूतों के संघर्ष और मराठाओं की बढ़ती शक्ति और महत्वाकांक्षाओं ने मुगल शक्ति को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया।

  • Mugal Samrajya ke wighatan ke Karan

    आर्थिक एवं प्रशासनिक समस्याएं

ऐसी विभिन्न आर्थिक एवं प्रशासनिक समस्याओं का जन्म हुआ, जिन्होंने मुगल सत्ता को परेशानी में डाल दिया। अमीर या मनसबदारों की संख्या में तीव्र वृद्धि के कारण उनके बीच जागीर के तौर पर भूमि वितरित करने हेतु भूमि की कमी हो गई। औरंगजेब ने जागीर या बेजागीरी की बेतहाशा कमी की समस्या का समाधान ढूंढने के प्रयास के तहत जागीर से बढ़ी आय को अभिलिखित करना और प्रस्तुत करना शुरू किया, जिसके परिणामस्वरूप अमीरों ने किसानों पर दबाव डालकर अपनी जागीर से अधिक आय प्राप्त करना शुरू कर दिया। इस कदम से मुगल शासन ने दोनों – अमीरों और बोझ से दबे किसानों से दुश्मनी मोल ले ली। 

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