Indian Navy Mutiny: भारतीय नौसेना का विद्रोह

भारत में अंग्रेजी शासन का आधार सेना थी। अंग्रेजों ने भारतीय सैनिकों की शक्ति से ही भारत को जीता था। विजयोपरांत भारत में शासन को बनाये रखने का आधार भी सेना ही थी। किंतु धीरे-धीरे भारतीय सेना में उपनिवेशी शासन के विरुद्ध प्रतिशोध की ज्वाला सुलगने लगी। यद्यपि 1857 के विद्रोह से ही भारतीय सैनिकों की अंग्रेजों के प्रति घृणा जाहिर होने लगी थी, तथापि अंग्रेजों ने इसके मूल कारणों पर ध्यान नहीं दिया तथा आगे भी प्रजातीय सर्वश्रेष्ठता तथा भेदभाव की नीति जारी रखी।
फरवरी 1946 में भारतीय नौसेना के विद्रोह ने तो अंग्रेज शासकों की नींद हराम कर दी। यद्यपि इसका मूल कारण भी अंग्रेजों की दंभपूर्णश्रेष्ठता की नीति एवं प्रजातीय भेदभाव था, तथापि अंग्रेजों ने इन कारकों को उपेक्षित कर दमन का सहारा लिया। नौसेना में विद्रोह से थलसेना तथा वायुसेना भी अछूती नहीं रही तथा उसने साम्राज्यवादी शासन के विरुद्ध असंतोष जाहिर किया।
इन परिस्थितियों में अंग्रेजी शासन का आधार स्तंभ (सेना) ही जब उसके विरुद्ध हो गया, तो अंग्रेजों के सम्मुख भारत छोड़ने के अतिरिक्त कोई विकल्प न बचा।
वामपंथ का उभरना
भारत में राष्ट्रवादी आंदोलन के साथ ही सामाजिक अतिवादी आंदोलन भी धीरे-धीरे पकड़ रहा था। इस वामपंथी संस्था के उत्थान ने अंग्रेजों के साथ संभवतः कांग्रेस को भी भयभीत कर दिया तथा इन्हें लगने लगा कि राष्ट्रीय नेतृत्वम कांग्रेस का स्थान अब वामपंथ ले लेगा। संभवत: यही कारण था कि कांग्रेस एवं अंग्रेज दोनों 1947 में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को शीघ्रातिशीघ्र क्रियान्वित करने हेतु सहमत हो गये।
द्वि-विकल्प सिद्धांत
भारतीय परिस्थितियों को अनियंत्रित होता देख अंग्रेज अधिकारी अब यह महसूस करने लगे कि या तो नौकरशाही में और अधिक अंग्रेजों को भर्ती कर उसका यूरोपीयकरण कर दें तथा भारत को उपनिवेश बनाये रखें या भारत को स्वतंत्र कर दें। प्रथम विकल्प अत्यंत मुश्किल कार्य था, अत: अंग्रेजों ने दूसरे विकल्प को उचित मानकर भारत छोड़ देने का निर्णय किया।
राष्ट्रमंडल का विकल्प
कुछ अंग्रेज इतिहासकारों के अनुसार, स्वतंत्रता के उपरांत भारत को राष्ट्रमंडल में शामिल करने की सुनिश्चितता से अंग्रेजों ने महसूस किया कि उनके छोड़ देने के उपरांत भी भारत में ब्रिटिश ताज का शासन अप्रत्यक्ष रूप से कायम रहेगा तथा भारत उसके अधीन बना रहेगा। इसके साथ ही सरकार उन रूढ़िवादी आलोचकों का मुंह बंद करने में भी सफल हो सकी, जो भारत को स्वतंत्रता दिये जाने का विरोध कर रहे थे।
क्योंकि उसने तर्क दिया क स्वतंत्र होने के उपरांत भी ब्रिटिश झंडे के तले ही रहेगा तथा उसके हितों का पक्षपोषण करता रहेगा। इस प्रकार इन्हीं सब कारकों एवं शक्तियों ने ऐसा वातावरण निर्मित किया, जिसके कारण अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर विवश होना पड़ा l
सामाजिक परिवर्तन एवं आंदोलन
रामचंद्र गुहा के अनुसार, 1970 के दशक के उत्तरार्द्ध में राजनीतिक एवं सामाजिक गलियारों में आंदोलन दृष्टिगोचर होने लगे। राजनीतिज्ञों ने समीचीनता के पक्ष में विचारधारा को त्याग दिया था, और राजव्यवस्था खंडित होने लगी थी। सामाजिक स्तर पर समाज के वर्गों, जिन्हें लंबे समय से शोषित किया जाता रहा था, ने इकट्ठा एवं एकजुट होना शुरू कर दिया था, और इसने कुछ सीमा तक सामाजिक कोलाहल को हवा दी। नारीवादी और पर्यावरणवादी जैसे नए सामाजिक आंदोलन अवतरित हुए। व्यापार संघों जैसे पुराने आंदोलन नए क्षेत्रों, जैसे खनन, तक विस्तारित हो चुके थे, और महिला एवं पुरुष को समान वेतन, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के लिए अभियान शुरू हो चुके थे।
उदारीकृत प्रेस ने विभिन्न एवं व्यापक विषयों पर लिखना शुरू कर दिया था। नवीन ऑफसेट प्रिंटिंग प्रेस के रूप में नई प्रौद्योगिकी ने समाचार पत्रों एवं जर्नल्स को नए क्षेत्रों तक प्रसारित करने में सहायता की। अपराध एवं भ्रष्टाचार को लेकर खोजी पत्रकारिता शुरू हुई। पाठक वर्ग में बढ़ोतरी हुई, विशिष्ट रूप से छोटे शहरों एवं कस्बों में, जैसाकि पत्रकारिता भारतीय भाषाओं में होने लगी थी और नागरिक स्वतंत्रता आंदोलन सक्रिय हो गया था।
सामाजिक वर्गों-ओबीसी (समाजवादी और लोक दल का निर्माण अधिकतर ओबीसी से हुआ था)-ने हरित क्रांति और भूमि सुधारों के माध्यम से आर्थिक शक्ति के साथ-साथ राजनीतिक शक्ति भी हासिल की। उन्हें अब प्रशासनिक व्यवस्था में भी स्थान मिलने लगा था। जनता सरकार ने 20 दिसंबर, 1978 को बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में छह सदस्यीय पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की घोषणा की। यह मंडल आयोग के नाम से चर्चित हुआ।
इसका काम इस बात की जांच करना था कि क्या केंद्रीय प्रशासन व्यवस्था में नौकरियों में ओबीसी को आरक्षण दिया जाना चाहिए था।