Azad Hind Fooz And Subhsh chandra Boss: आजाद हिन्द फौज और सुभाष चंद्र बोस

व्यक्त की। उन्होंने भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा चौथे स्थान के साथ उत्तीर्ण यूरोपियों द्वारा भारतीयों के किसी भी प्रकार के अपमान के विरुद्ध जोरदार प्रतिक्रिया सुभाष चंद्र बोस एक निडर व्यक्ति थे। उन्होंने सदैव उग्रवादी तेवर दिखाए औरचित्तरंजन दास उनके राजनीतिक गुरु थे। 1923 में वे कलकत्ता के मेयर बने।
की लेकिन आजादी के संघर्ष में भाग लेने के लिए 1921 में त्यागपत्र दे दिया। ब्रिटिश शासन ने उन्हें कई बार जेल भेजा। सुभाष चंद्र बोस को जब एक बार गांधी के तरीकों को ही अपनाएगी, तो उन्होंने आजादी की लड़ाई अपने तरीके यह स्पष्ट हो गया कि वे गांधी के तरीके को नहीं अपनाएंगे लेकिन कांग्रेस से लड़ने का निर्णय किया।
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मार्च 1940 में, बोस ने रामगढ़ में समझौता विरोधी सम्मेलन संचालित किया।
- यह फॉरवर्ड ब्लॉक और किसान सभा का संयुक्त प्रयास था। सम्मेलन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि 6 अप्रैल को विश्वव्यापी संघर्ष शुरू किया जाना चाहिए।
और लोगों से साम्राज्यवादी युद्ध में किसी भी प्रकार से सहयोग न करने का आह्वान किया गया। उन्होंने साम्राज्यवादी हितों के लिए किसी भी रूप में प्रयोग किए जाने वाले भारतीय संसाधनों का प्रतिरोध करने की बात कही 16 अप्रैल को प्रारंभ किए गए संघर्ष में लोगों ने उत्साहजनक भागीदारी की।
सुभाष चंद्र बोस को उस समय (जुलाई 1940) गिरफ्तार किया गया जब वे कलकत्ता में होलवेल स्मारक के विरुद्ध प्रस्तावित सत्याग्रह शुरू करने का प्रयास कर रहे थे। भूख हड़ताल के बाद उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया और दिसंबर 1940 में घर में नजरबंद किया गया। जनवरी 1941 में बोस वहां से बच निकले।
26 जनवरी 1941 को वे भगत राम की मदद से जिआउद्दीन (छद्म नाम) नाम से पेशावर पहुंच गए। बाद में, यह सुनने को मिला कि उन्होंने देश की आजादी में बाहर से योगदान देने के लिए भारत छोड़ दिया। उन्होंने ब्रिटेन में रहकर भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में मदद हेतु रूस से संपर्क किया। लेकिन जून 1941 में, रूस युद्ध में शामिल हो ।गया, जिससे बोस को बेहद निराशा हुई। फिर वे जर्मनी चले गए। बोस ओरलेंडो मेजोटा नामक छद्म नाम से हिटलर से मिले। हिटलर की मदद से, उन्होंने जर्मनी एव इटली में पकड़े गए भारतीय मूल के सभी युद्धबंदियों /
को एकजुट कर ‘फ्रीडम आर्मी’ (मुक्ति सेना) गठित की। जर्मनी के ड्रेसडेनमें फ्रीडम आर्मी का ऑफिस बनाया गया। जर्मनी के लोगों ने बोस को ‘नेताजी / कहकर पुकारा। उन्होंने जर्मनी के फ्री इंडिया सेंटर से जय हिंद का नारा दिया।
उन्होंने जनवरी 1942 में, बर्लिन रेडियो से नियमित प्रसारण किया, जिसने भारतीयों को उत्साहित किया। 1943 के प्रारंभ में उन्होंने जर्मनी छोड़ दिया तथा जर्मनी को जापानी पनडुब्बियों के माध्यम से जुलाई 1943 में पहले जापान और फिर सिंगापुर पहुंचे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की कमान रासबिहारी बोस ने ले ली, लेकिन वह आजाद हिन्द फौज (आईएनए) का दूसरा चरण था।
• आजाद हिन्द फौज का उदय तथा प्रथम चरण
आजाद हिन्द फौज या इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) की स्थापना का विचार सर्वप्रथम मोहन सिंह के मन में मलाया में आया। मोहन सिंह, ब्रिटिश सेना में एक भारतीय सैन्य अधिकारी थे, किंतु कालांतर में उन्होंने साम्राज्यवादी ब्रिटिश सेना में सेवा करने के स्थान पर जापानी सेना की सहायता से अंग्रेजों को भारत से निष्कासित करने का निश्चय किया।
जापानी सेना ने जब भारतीय युद्धबंदियों को मोहन सिंह को सौंपना प्रारंभ कर दिया, तो वे उन्हें आजाद हिन्द फौज में भर्ती करने लगे। सिंगापुर के जापानियों के हाथ में आने के पश्चात मोहन सिंह को 45 हजार युद्धबंदी प्राप्त हुए। यह घटना अत्यंत महत्वपूर्ण थी। 1942 के अंत तक इनमें से 40 हजार लोग आजाद हिन्द
फौज में सम्मिलित होने को राजी हो गये। आजाद हिन्द फौज के अधिकारियों ने निश्चय किया कि वे कांग्रेस एवं भारतीयों द्वारा आमंत्रित किये जाने के पश्चात ही कार्रवाई करेंगे। बहुत से लोगों का यह भी मानना था कि आजाद हिन्द फौज के कारण जापान, दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीयों से दुर्व्यवहार नहीं करेगा या भारत पर अधिकार करने के बारे में नहीं सोचेगा।
भारत छोड़ो आंदोलन ने आजाद हिन्द फौज को एक नई ताकत प्रदान की। मलाया में ब्रिटेन के विरुद्ध तीव्र प्रदर्शन किये गये। 1 सितंबर, 1942 को 16,300 सैनिकों को लेकर आजाद हिन्द फौज की पहली डिवीजन का गठन किया गया। इस समय तक जापान, भारत पर आक्रमण करने की योजना बनाने लगा था।
भारतीय सैनिकों के संगठित होने से जापान अपनी योजना को मूर्तरूप देने हेतु उत्साहित हो गया। किंतु दिसंबर 1942 तक आते-आते आजाद हिन्द फौज की भूमिका के प्रश्न पर मोहन सिंह एवं अन्य भारतीय सैन्य अधिकारियों तथा जापानी अधिकारियों के बीच तीव्र मतभेद पैदा हो गये। दरअसल, जापानी अधिकारियों की मंशा थी भारतीय सेना प्रतीकात्मक हो तथा उसकी संख्या दो हजार तक सीमित रखी। जाये, किंतु मोहन सिंह का उद्देश्य दो लाख सैनिकों की फौज तैयार करना था। जापानियों ने मोहन सिंह को अपनी कैद में ले लिया।