गांधी जी ने आंदोलन वापस क्यों लिया

गांधी जी ने महसूस किया कि भारतीयों ने अभी अहिंसा के सिद्धांत को अच्छी से नहीं सीखा है या पूर्ण रूप से वे उसे नहीं समझ सके हैं। उन्हें लगा कि आंदोलन की बागडोर उनके हाथों से निकलकर हिंसक हाथों में जाने वाली है। उनका मानना था कि हिंसक आंदोलन को सरकार द्वारा राज्य के हितों की रक्षा के बहाने आसानी से कुचला जा सकता है, तथा इसके पीछे सरकार यह तर्क दे सकती है कि हिंसा को दबाने के लिये हथियारों का सहारा लेना उसकी विवशता थी।
गांधी जी को आशंका थी कि इस तरह की कार्रवाइयों से अहिंसक असहयोग आंदोलन की पूरी रणनीति विफल हो जायेगी। गांधी जी के अहिंसक आंदोलन की रणनीति यह थी कि शांतिपूर्ण आंदोलन के विरुद्ध यदि उपनिवेशी सरकार दमन का सहारा लेगी, तो भावनात्मक तौर पर भारतीय इसके विरुद्ध हो जायेंगे तथा सरकार का वास्तविक चेहरा अनावृत हो जायेगा।
आंदोलन धीरे-धीरे उबाऊ या थकाने वाला बन रहा था। यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि सरकार किसी भी प्रकार से समझौतावादी रुख अपनाने के लिये तैयार नहीं थी। इन परिस्थितियों में इतने व्यापक स्तर पर चल रहे आंदोलन को बहुत ज्यादा नहीं खींचा जा सकता था।
इस आंदोलन का मुख्य मुद्दा खिलाफत भी कुछ समय बाद अप्रासंगिक हो गय क्योंकि नवंबर 1922 में तुर्की की जनता ने मुस्तफा कमाल पाशा के नेतृत्व विद्रोह कर दिया तथा सुल्तान के राजनैतिक अधिकार छीन लिये गये। खलीफा
का पद समाप्त कर तुर्की में धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना कर दी गई। संपूर्ण तुर्की में यूरोप की तर्ज पर विधिक व्यवस्था की स्थापना की गई, तथा महिलाओं को व्यापक अधिकार प्रदान किये गये। शिक्षा का राष्ट्रीयकरण किया गया तथा
आधुनिक उद्योगों एवं कृषि को प्रोत्साहित किया गया। 1924 में खलीफा का पद पूर्णरूपेण समाप्त कर दिया गया।
खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन
का मूल्यांकन
इस आंदोलन ने शहरी मुसलमानों को राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा में सम्मिलित किया, किंतु कुछ अर्थों में इसने राष्ट्रीय राजनीति का सांप्रदायीकरण भी किया। मुसलमानों की भागीदारी ने इस आंदोलन को जन आंदोलन का स्वरूप दिया, किंतु बाद के वर्षों में जब सांप्रदायिकता ने जोर पकड़ा तो राष्ट्रीय आंदोलन में सांप्रदायिक सौहार्द का यह चरित्र बरकरार न रह सका l
आंदोलन के नेता मुसलमानों की धार्मिक तथा राजनीतिक चेतना को धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक चेतना के रूप में विकसित करने में भी असफल रहे। असहयोग आंदोलन ने पहली बार पूरे राष्ट्र की जनता को एक आंदोलन से सिद्ध हो गया कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कुछ नहीं, अपितु पूरे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था है।
कोने-कोने में अपना प्रभाव डाला तथा कोई जगह ऐसी नहीं के प्रभाव से अछूती रह गई हो। आंदोलन में समाज के हर वर्ग, यथा-कृषक, शहरी, ग्रामीण, दस्तकार, बुद्धिजीवी, छात्र, गरीब, वृद्ध, बच्चे, व्यापारी, व्यवसायी, कर्मचारी, पुरुष, महिला इत्यादि, ने सक्रिय रूप से भाग लिया। इस आंदोलन ने देश की जनता को आधुनिक राजनीति से परिचित कराया तथा उनमें स्वतंत्रता | की भूख जगाई। आंदोलन ने सिद्ध कर दिया कि भारत के लोग राजनीतिक संघर्ष |
नागरिक संघर्ष कर सकता है। इससे अंग्रेजों की यह भ्रांत धारणा भी टूट गई कि । भारतीयों में चेतना का अभाव है तथा दासता की त्रासदी को वे अपने भाग्य की। नियति मानते हैं। उपनिवेशी शासन दो मिथ्या अवधारणाओं पर आधारित था- पहला हकि, विदेशी शासन भारतीयों के हित में है; तथा दूसरा, कि वह अजेय है।
तथा उसे कोई परास्त नहीं कर सकता। प्रथम मिथक को नरमपंथी राष्ट्रवादियों सरकार की आर्थिक शोषण की प्रवृत्ति को उजागर कर पहले ही तोड़ दिया। इसकी जड़ों को हिलाकर रख दिया। इस प्रकार, आंदोलन के पश्चात भारतीयों था तथा दूसरे मिथक को इस आंदोलन ने ‘सत्याग्रह’ द्वारा कड़ी चुनौती दी, और का साम्राज्यवादी शासन से भय जाता रहा तथा वे स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रति पूर्णरूप से लालायित हो गये।