गांधी जी का हरिजन अभियान एवं जाति संबंधी विचार

गांधी जी का हरिजन अभियान एवं जाति संबंधी विचार

 

गांधी जी का हरिजन अभियान एवं जाति संबंधी विचार
गांधी जी का हरिजन अभियान एवं जाति संबंधी विचार

 

साम्प्रदायिक अधिनिर्णय द्वारा भारतीयों को विभाजित करने तथा पूना पैक्र हिंदुओं से दलितों को पृथक करने की व्यवस्थाओं ने गांधी जी को बुरी आहत कर दिया था। फिर भी गांधी जी ने पूना समझौते के प्रावधानों का तरह पालन किये जाने का वचन दिया। अपने वचन को पूरा करने के उसे गांधी जी ने अपने अन्य कार्यों को छोड़ दिया तथा पूर्णरूपेण ‘अस्पृश् निवारण अभियान’ में जुट गये। उन्होंने अपना अभियान यरवदा जेल से ही प्रारंभ कर दिया था। तत्पश्चात, अगस्त 1933 में जेल से रिहा होने के उपरांत उनके आंदोलन में और तेजी आ गई।

अपने कारावास की अवधि में ही उन्होंने सितंबर 1932 में अखिल भारतीय अस्पृश्यता विरोधी लीग (ऑल इंडिया एंटी-अनटचेबिलिटी लीग) का गठन कि जिसका बाद में नाम बदलकर हरिजन सेवक संघ कर दिया गया तथा जनवरी 1933 में उन्होंने हरिजन नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया। ज से रिहाई के उपरांत वे सत्याग्रह आश्रम वर्धा आ गये। साबरमती आश्रम, गांधी जी ने 1930 में ही छोड़ दिया था और प्रतिज्ञा की थी कि स्वराज्य मिलने पश्चात ही वे साबरमती आश्रम (अहमदाबाद) में वापस लौटेंगे। 7 नवंबर, 19 को वर्धा से उन्होंने अपनी ‘हरिजन यात्रा प्रारंभ की। नवंबर 1933 से जुलाई।

1934 तक गांधी जी ने पूरे देश की यात्रा की तथा लगभग 20 हजार किलोमीटर का सफर तय किया। अपनी यात्रा के दौरान इन्होंने ‘हरिजन सेवक संघ’ लिये जगह-जगह कोष एकत्रित करने का कार्य भी किया। उनकी इस या का मुख्य उद्देश्य था-हर रूप में अस्पृश्यता को समाप्त करना। उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं से आग्रह किया कि वे गांवों का भ्रमण कर हरिजनों के सामाजिक आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक उत्थान का कार्य करें। दलितों को ‘हरिजन नाम सर्वप्रथम गांधी जी ने ही दिया था।

हरिजन उत्थान के इस अभियान में गांधी जो 8 मई व 16 अगस्त, 1933 को दो बार लंबे अनशन पर बैठे। उनके अनशन का उद्देश्य, अपने समर्थकों को अपने प्रयासों की गंभीरता एवं अति से अवगत कराना था। अनशन की रणनीति ने राष्ट्रवादी खेमे को बहुत प्रभावित किया। बहुत से लोग भावुक हो गये।

हरिजन आंदोलन के दौरान गांधी जी को हर कदम पर सामाजिक प्रतिक्रियावादियों तथा कट्टरपंथियों के विरोध का सामना करना पड़ा। उनके खिलाफ प्रदर्शन सविनय अवज्ञा आंदोलन तथा कांग्रेस का विरोध करने के निमित्त सरकार ने इन किये गए तथा उन पर हिंदुत्व पर कुठाराघात करने का आरोप लगाया गया। प्रतिक्रियावादी तत्वों का भरपूर साथ दिया। अगस्त 1934 में लेजिस्लेटिव असेंबली ‘मंदिर प्रवेश विधेयक’ को गिराकर, सरकार ने इन्हें अनुग्रहित करने का प्रयत्न किया।

बंगाल में कट्टरपंथी हिंदू विचारकों ने पूना समझौते द्वारा हरिजनों को हिंदू अल्पसंख्यक का दर्जा दिये जाने की अवधारणा को पूर्णतया खारिज कर दिया। गंधी जी ने अपने पूरे हरिजन आंदोलन, सामाजिक कार्यों एवं अनशनों में कुछ मूलभूत तथ्यों पर सर्वाधिक जोर दिया:

उन्होंने हिंदू समाज में हरिजनों पर किये जा रहे अत्याचार तथा भेदभाव की तीव्र भर्त्सना की। दूसरा प्रमुख मुद्दा था- छुआछूत को जड़ से समाप्त करना। उन्होंने अस्पृश्यता की कुरीति को समूल नष्ट करने तथा हरिजनों को मंदिर में प्रवेश का अधिकार दिये जाने की मांग की। उन्होंने इस बात की मांग उठाई कि हिंदुओं द्वारा सदियों से हरिजनों पर जो अत्याचार किये जा रहे हैं, उन्हें अतिशीघ्र बंद किया जाना चाहिए तथा इस बात का प्रायश्चित करना चाहिए। शायद यही वजह थी कि गांधी जी ने अंबेडकर या अन्य हरिजन नेताओं की आलोचनाओं का कभी बुरा नहीं माना।

उन्होंने हिंदू समाज को चेतावनी दी कि, “यदि अस्पृश्यता का रोग समाप्त नहीं हुआ तो हिंदू समाज समाप्त हो जायेगा। यदि हिंदुत्व को जीवित रखना है, तो अस्पृश्यता को समाप्त करना ही होगा।” गांधी जी का संपूर्ण हरिजन अभियान मानवता एवं तर्क के सिद्धांत पर अवलंबित ऐसी अवधारणा प्रस्तुत करते हैं तो हमें उनकी उपेक्षा कर देनी चाहिए, क्योंकि था। उन्होंने कहा कि ‘शास्त्र’ छुआछूत की इजाजत नहीं देते हैं। लेकिन यदि वे ऐसा करना मानवीय प्रतिष्ठा के विरुद्ध है। 

 

चीजें स्वयं हिंदू सवर्ण समाज एवं हरिजनों के बीच में भी हैं। उनका कहना था कि उनके हरिजन अभियान का मुख्य उद्देश्य, उन कठिनाइयों एवं कुरीतियों को। दूर करना है, जिनके कारण हरिजन समाज शोषित और पिछड़ा है। इसी प्रकार उन्होंने जाति निवारण तथा छुआछूत निवारण में भी भेद किया। इस मुद्दे पर वे डॉ. अंबेडकर के इन विचारों से असहमत थे कि ‘छुआछूत की बुराई जाति प्रथा की देन हैं तथा जब तक जाति प्रथा बनी रहेगी यह बुराई भी जीवित रहेगी। अत:, जाति प्रथा को समाप्त किये बिना अछूतों का उद्धार संभव नहीं है।

गांधी जी का कहना था, कि वर्णाश्रम व्यवस्था के अपने कुछ दोष हो सकते हैं. लेकिन इसमें कोई पाप नहीं है। हां, छुआछूत अवश्य पाप है। उनका तर्क था कि छुआछूत, जाति प्रथा के कारण नहीं अपितु ऊंच-नीच के कृत्रिम विभाजन के कारण है। यदि जातियां एक-दूसरे की सहयोगी एवं पूरक बनकर रहें, तो जाति प्रथा में कोई दोष नहीं है। कोई भी जाति न उच्च है न निम्न। उन्होंने वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थकों एवं विरोधियों दोनों से आह्वान किया कि वे आपस में मिलकर काम करें, क्योंकि दोनों ही छुआछूत के विरुद्ध हैं।

 

रहे विरोधी छुआ छूत गांधी जी का विचार था कि छुआछूत की बुराई का उन्मूलन करने से उसका सांप्रदायिकता एवं ऐसे ही अन्य मुद्दों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, जबकि इसकी उपस्थिति का तात्पर्य होगा–जाति प्रथा में उच्च एवं निम्न की अवधारणा को स्वीकार करना। गांधी जी ने छुआछूत के समर्थक दकियानूसी प्रतिक्रियावादी हिंदुओं को ‘सेनापति’ कहा, किंतु वे उन पर किसी प्रकार का दबाव डाले जाने के विरोधी थे। उनका कहना था कि उन्हें समझा-बुझाकर तथा इनके दिलों को जीतकर उन्हें सही रास्ते पर लाना होगा न कि उन पर दबाव डालकर।

उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके अनशन का उद्देश्य, उनके द्वारा चलाये जा आंदोलन के संबंध में उनके मित्रों एवं अनुयायियों के उत्साह को दुगना करना है। अभियान का प्रभाव: गांधी जी ने बार-बार यह बात दोहराई कि उनके हरिजन शुद्धिकरण आंदोलन है। वास्तव में, गांधी जी ने अपने हरिजन अभियान के दौरान अभियान का उद्देश्य राजनीतिक नहीं है, अपितु यह हिंदू समाज एवं हिंदुत्व का केवल हरिजनों के लिये ही कार्य नहीं किया; उन्होंने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं किस प्रकार के रचनात्मक कार्यों में लगा सकते हैं।

उनके आंदोलन ने राष्ट्रवाद को बताया कि जन-आंदोलन के निष्क्रिय या समाप्त हो जाने पर वे स्वयं को के संदेश को हरिजनों तक पहुंचाया। यह वह वर्ग था, जिसके अधिकांश सदस्य खेतिहर मजदूर थे तथा धीरे-धीरे किसान आंदोलन तथा राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ते जा रहे थे।

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