भारत में डचों का पतन: Decline of the Dutch in India

लगभग तीन शताब्दियों तक पूर्वी द्वीप समूहों पर डचों का अधिकार रहा, परंतु अंग्रेजों ने भारत में उन्हें स्थापित नहीं होने दिया। जिस शक्ति के साथ डचों ने पुर्तगालियों को पराजित किया था, वह शक्ति अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई में काम नहीं आ सकी। आरंभिक वर्षों में डचों एवं अंग्रेजों के बीच अच्छे संबंध थे, किंतु बाद में व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता के कारण वे एक-दूसरे के शत्रु बन गए।
आरंभ में डचों ने कुछ हद तक अंग्रेजों का मुकाबला भी किया, परंतु बाद में अंग्रेजों ने उन्हें दबा दिया। डच कंपनी राष्ट्रीय अधिकारिता के अधीन थी, जिससे डच कर्मचारियों में अंग्रेजी कंपनी के कर्मचारियों के समान नेतृत्व की भावना तथा उत्साह का अभाव था। डच कंपनी के अधिकारियों का वेतन बहुत कम था, इसलिए वे अपने निजी व्यापार में ही ज्यादा सक्रियता दिखाते थे। प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से वे कंपनी के हितों की अनदेखी करते थे। अधिकारियों की उपेक्षापूर्ण नीति के कारण डच कंपनी की स्थिति निरंतर खराब होती चली गई।
हॉलैंड लंबी अवधि तक पराधीन रहा था, इसलिए उसके पास साधनों की पर्याप्तता नहीं थी; जबकि दूसरी ओर इंग्लैंड सदा स्वाधीन रहा था, और उसके पास साधनों की प्रचुरता थी। इसलिए, इंग्लैंड अपनी इच्छा के अनुसार साधनों एवं शक्ति में वृद्धि करने तथा आवश्यकतानुसार उनका उपयोग करने में भी सफल रहा। बाद के वर्षों में डच व्यापारियों ने भारत की अपेक्षा दक्षिण-पूर्वी एशिया के मसालों के द्वीपों की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया। इन्हीं द्वीपों में अपनी विकासात्मक गतिविधियों को केंद्रित करने के कारण डचों को भारत में स्थित अपनी बस्तियों से हाथ धोना पड़ा।
यूरोप में अपनी स्थिति तथा समुद्र पर अधिकार खो देने के पश्चात कोई भी शक्ति पूर्व में अपनी प्रमुखता नहीं बनाए रख सकती थी, और ऐसा ही डचों के साथ भी हुआ। डचों ने यूरोप में फ्रांसीसियों तथा अंग्रेजों से शक्ति में ह्रास कर लिया था, और इस कारण वे पूर्व में अपने साम्राज्य को कायम युद्ध करके अपने रखने में असफल हो गए।
अंग्रेजव्यापारिक गतिविधियां आरंभ की थीं, में अंग्रेज सर्वाधिक सफल एवं प्रभावोत्पादक उन यूरोपीय शक्तियों, जिन्होंने भारत और हिंद महासागरीय क्षेत्र में आकर नवीनसिद्ध हुए। गौर करने लायक बात यह है कि पूर्वी देशों की ओर व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में अंग्रेज अपेक्षाकृत देर सe आए, किंतु वे शेष यूरोपीय शक्तियों को हराते हुए सबसे आगे निकल गए।
इसकी मुख्य वजह यह थी कि अंग्रेज भारत सहित एशियाई व्यापार के स्वरूप को समझने में सफल रहे, और उन्होंने इसके लिए सैनिक-राजनैतिक शक्ति का सहारा लिया। मौलिक कारण यह था कि इंग्लैंड की उपभोक्ता संस्कृति, औद्योगिक विकास, मांग व आपूर्ति का संतुलन एवं अनुकूल राजनीतिक स्थिति ने पूंजी निवेश की प्रवृत्ति को बहुत अधिक प्रोत्साहित किया।
16वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक एशियाई वस्तुएं यूरोप में पहुंचने लगी थीं। इस लाभ के व्यापार ने अंग्रेजों को पूर्व की ओर आने के लिए प्रेरित किया। 1599 में एक दुस्साहसी व्यापारी मिल्डेनहॉल भारत आया था।
महारानी एलिजाबेथ प्रथम का चार्टर अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 1600 में हुई। पूर्व में अंग्रेजों या इंग्लैंड के व्यापार के संदर्भ में प्रथम महत्वपूर्ण कदम 31 दिसंबर, 1600 में उठाया गया, जब महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने एक चार्टर (आदेश-पत्र) जारी करके गवर्नर और लंदन की कंपनी के व्यापारियों को पूरब में व्यापार करने के विशिष्ट प्रदान किए। प्रारंभ में ये विशेषाधिकार 15 वर्षों के लिए प्रदान किए गए, जिन्हें मई 1609 में एक नवीन चार्टर (आदेश-पत्र) के माध्यम से अनिश्चित काल के लिए विस्तारित कर दिया गया। शुरुआती वर्षों में, सामान्य तौर पर भारत में व्यापारियों के एक समूह का स्वतंत्र बेड़ा भेजा जाता था, ऐसी यात्रा से प्राप्त लाभ को वे आपस में बांट लेते थे।
ईस्ट इंडिया कंपनी की प्रगति
पश्चिम एवं दक्षिण भारत में कदमः वित्तीय दृष्टि से ईस्ट इंडिया कंपनी, डच कंपनी की तुलना में छोटी कंपनी थी। ईस्ट इंडिया कंपनी को डच कंपनी की
- तुलना में अपनी प्रथम व्यापार यात्रा में कम आमदनी हुई। इसके बावजूद अंग्रेजी
- निदेशकों का समूह था, जिसका चुनाव प्रत्येक वर्ष शेयरहोल्डर्स की आम सभा में कंपनी की एक विशेषता यह थी कि उसका संगठन बड़ा ही सहज था; इसमें 24
- होता था। शुरू में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना ध्यान मसाले के व्यापार, विशेष
रूप से इंडोनेशिया से काली मिर्च और मसाला प्राप्त होने वाले द्वीप, तक केंद्रित रखा। प्रथम 12 वर्षों तक इन्हें प्रत्येक वर्ष 20 प्रतिशत लाभ प्राप्त होता रहा।