भारत-पाकिस्तान युद्ध

1965 में, भारत ने पाकिस्तान की ओर से युद्ध के खतरे का सामना किया। 1958 में सैन्य तख्तापलट के माध्यम से जनरल मोहम्मद अयूब खान पाकिस्तान की सत्ता पर काबिज हो गए, और बलपूर्वक राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा को अपदस्थ कर स्वयं राष्ट्रपति पद हथिया लिया। ऐसी स्थिति में अमेरिका पाकिस्तान को पूरी सैन्य सहायता प्रदान कर रहा था।
1962 में चीन के साथ युद्ध बलों समेत भारतीयों को निरुत्साहित किया था। अतः, अयूब खान ने सोचा कि संभवतः सीमा पर भारतीय सैन्य बलों के साथ जोर-आजमाइश का यह सही समय है। अप्रैल 1965 में, पाकिस्तान ने सिंध में इसकी शुरुआत की। उन्हें लगा कि पाकिस्तान कच्छ के रन में प्रथम लड़ाई जीत सकता है।
दोनों तरफ, ब्रिटेन के हस्तक्षेप से, गोलीबारी बंद करने पर सहमति बन गई और झड़प से पहले की स्थिति कायम की गई। इस बात से आश्वस्त होने पर कि भारतीय सेना कमजोर हो गई, और कश्मीर घाटी में शेख अब्दुल्ला एवं अन्य विरोधियों द्वारा कोलाहल उत्पन्न करने पर पाकिस्तान में सत्ताधारियों ने कश्मीर में हमला करने का निर्णय लिया।
अगस्त (1965) में इस विचार के साथ कि भारतीय फौज एवं पुराने टैंकों के सीमा पर इकट्ठा होने से पहले कश्मीर तक केवल महत्वपूर्ण स्थलीय मार्ग का प्रयोग किया जाना था, ऑपरेशन ग्रांडसलेम शुरू किया गया। इस कार्य में पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री, जुल्फिकार अली भुट्टो ने अयूब खान को प्रोत्साहित किया।
कश्मीर घाटी में उपद्रव फैलाने के उद्देश्य से पाकिस्तान द्वारा सुप्रशिक्षित घुसपैठियों को भेजा गया। भारतीय प्रधानमंत्री ने इस समय अपनी मानसिक शक्ति का परिचय दिया। पाकिस्तान ने दावा किया कि कश्मीर में भारत द्वारा कब्जा किए जाने के खिलाफ उपद्रव हो रहा है। भारत ने वैश्विक समुदाय का ध्यान इस ओर दिलाया कि पाकिस्तान, जैसाकि पाकिस्तान द्वारा कहा जाता है, ‘आजाद कश्मीर’ 1 ( भारत )
सरकार इसे पाक अधिकृत कश्मीर [POK] कहती है) से जम्मू-कश्मीर में सशस्त्र घुसपैठियों को भारतीय क्षेत्र में भेजकर कोलाहल एवं उपद्रव को हवा दे रहा है। इस बात की घोषणा हो जाने पर कि दोनों देशों की फौजें आमने-सामने होंगी, शास्त्री जी ने आदेश दिया कि भारतीय सेना सीजफायर लाइन को पार कर सकती है और घुसपैठियों द्वारा प्रयोग किए जा रहे मार्ग को बंद कर सकती
है। सितंबर 1965 में, दूसरा भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू हो गया। शास्त्री जी ने सिद्ध किया कि वह इस प्रकार निर्णय ले सकते हैं, जिस प्रकार नेहरू जी ने नहीं लिए। उन्होंने भारतीय फौजों को जरूरी प्रतिशोधात्मक कदम उठाने की अनुमति देने में कुछ समय लिया। उनके रक्षा मंत्री, वाई.बी. चव्हाण, भी उत्कृष्ट साबित हुए।
सितंबर 1965 में, भारतीय फौजों ने पंजाब में सीमा के आर-पार लाहौर एवं सियालकोट को निशाना बनाने के उद्देश्य से अपने टैंकों के साथ तीन-तरफा हमला किया। यह भी पहली बार था कि स्वतंत्रता के पश्चात युद्ध में भारतीय वायु सेना ने भाग लिया।