1985 के आम चुनाव

1985 के आम चुनाव 

1985 के आम चुनाव 
1985 के आम चुनाव

 

अक्टूबर 1984 में प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त किए गए राजीव गांधी ने समय इनका आयोजन दिसंबर 1984 में होना था। कांग्रेस (आई) ने 400 से अधिक पूर्व चुनावों की सिफारिश की। जनवरी 1985 में आम चुनाव कराए गए, जबकि लोक सभा सीट जीतकर ऐतिहासिक जीत हासिल की, क्योंकि स्वतंत्रता के पश्चात किसी भी पार्टी द्वारा आम चुनावों में इतनी सीटें नहीं जीतीं गई थीं। यह जनादेश आंशिक रूप से इंदिरा जी के परिवार के प्रति सहानुभूति की लहर, और व्यापक रूप से उग्रवाद तथा पृथकतावाद को हतोत्साहित करने की इच्छा कापरिणाम था।

 

राजीव गांधी, जिन्होंने प्रधानमंत्री का पद संभाला, भारत के पहले युवा प्रधानमंत्री बने। मार्च 1985 के 11 राज्य विधान सभा चुनावों में कांग्रेस ने आठ राज्यों में सरकार बनाई। राज्यों में तनाव से निपटना जब राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री के रूप में पद संभाला, तो देश के विभिन्न हिस्सों में कई नस्लीय एवं जातीय संघर्ष हुए। इनमें से कुछ को हल कर लिया गया, लेकिन कुछ निरंतर परेशानी खड़ी करते रहे।

पंजाब की समस्या अत्यधिक ज्वलंत थी। अकाली नेताओं को जेल से रिहा कर दिया गया था, और जुलाई 1985 में राजीव गांधी तथा अकाली नेता संत हरचरण सिंह लोंगोवाल के बीच एक समझौता हुआ। लेकिन अगस्त 1985 में लोंगोवाल की हत्या कर दी गई। हालांकि, सितंबर में चुनाव कराए गए और यह देखा गया कि उग्रवाद के खिलाफ लोगों ने मतदान किया था, फिर भी अकाली दल बहुमत से सत्ता में आ गया। लेकिन उग्रवाद का अंत आसानी से नहीं हुआ। इसने फिर से अपना सिर उठा लिया, और एक बार फिर स्वर्ण मंदिर का इस्तेमाल उग्रवादियों द्वारा किया जाने लगा।

 

इस बार, स्वर्ण मंदिर से उग्रवादियों को बाहर करने के लिए मई 1988 में शुरू किए गए ऑपरेशन ‘ब्लैक थंडर’ शुरू होने के पश्चात जे.एफ. रिबेरो और के.पी.एस. गिल के नेतृत्व में पुलिस स्थिति को नियंत्रण में लाने में सफल हो गई। यह निर्बाध एवं प्रभावी ऑपरेशन था, लेकिन इस समय भिडरांवाले की तरह लोगों की भावनाओं को भड़काने वाला कोई करिश्माई नेता नहीं था। अभी भी, उग्रवाद पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ था अपितु कुछ समय के लिए शांत हुआ था। चंडीगढ़ का मामला निरंतर तूल पकड़ रहा था।

 

बाहरी लोगों के राज्य में आने को लेकर 1970 और 1980 के दशकों में असम में विरोध प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया। राजीव गांधी और ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (AASU) ने 15 अगस्त, 1985 को एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। राज्य से राष्ट्रपति शासन हटा लिया गया और दिसंबर 1985 में चुनाव कराए गए। आसू (AASU) राजनीतिक दल बन गया और इसका नाम असम गण परिषद् रखा गया, जिसने चुनाव में हिस्सा लिया। इसने कांग्रेस को हुए भारी विजय प्राप्त की।

 

मिजो विद्रोहियों ने अपने हथियार डाल दिए। मिजोरम को राज्य का दर्जा प्रदान मिजो लोगों और केंद्र के बीच 1986 में एक और समझौता हुआ, जिसके तहत किया गया। लालडेंगा-जो शुरुआत में भारत से अलग होने को लेकर एक विद्रोही नेता थे- के नेतृत्व में मिजो नेशनल फ्रंट ने विजय प्राप्त की और वे मिजोरम, जो फरवरी 1987 भारत का 23वां राज्य बना, के मुख्यमंत्री बने।

हालांकि, देश के अन्य हिस्सों में और साथ-ही-साथ बाद में कुछ राज्यों में फिर से समस्याएं उत्पन्न हुई। सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में गोरखा और नेशनल लिबरेशन फ्रंट ने पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में नेपाली भाषी लोगों के हितों का प्रतिनिधित्व किया, और अपने लिए एक पृथक राज्य की मांग की। राजीव गांधी से मुलाकात के पश्चात घीसिंग एक स्वायत्त जिला परिषद् के दर्श को स्वीकार करने हेतु मान गए।

 

त्रिपुरा, आदिवासियों और बंगालियों, जो विभाजन के पश्चात राज्य में आ गए थे, के बीच विरोध-प्रदर्शन और झड़पों से आहत था। त्रिपुरा नेशनल वॉलेंटियर्स (टीएनवी) ने अपहरण एवं हत्याएं करके नागरिकों और पुलिस को आतंकवादी गतिविधियों द्वारा डराने का प्रयास किया। अगस्त 1988 में एक एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए, जिसके तहत टीएनवी ने हिंसा और पृथक देश की मांग को छोड़ दिया, तथा भारत के संविधान के अंतर्गत त्रिपुरा की सभी समस्याओं के शांतिपूर्ण समाधान हेतु बातचीत का रास्ता अपनाया।

 

भारत सरकार इस बात पर सहमत हुई कि राज्य विधान सभा में आदिवासियों के लिए अधिक सीट बढ़ाई जाएगी, तथा कुछ अधिक गांवों को स्वायत्त आदिवासी परिषद् के अंतर्गत लाया जाएगा। केंद्र, त्रिपुरा सरकार और टीएनवी के बीच वार्ता के माध्यम से आत्मसमर्पण की शर्तों का एक खाका तैयार किया गया। हालांकि, समस्याओं का पूरी तरह अंत नहीं हुआ था।

 

असम में, स्थानीय असमियों के खिलाफ बोडो आदिवासियों के नेतृत्व में हिंसक विरोध-प्रदर्शन किया गया। इसकी कमान ऑल बोडो स्टूडेंट यूनियन को सौंपी गई थी। समस्याओं के समाधान के कुछ प्रस्ताव भविष्य में कुछ वर्षों बाद रखे गए। जम्मू एवं कश्मीर में एक अलग प्रकार की समस्या उत्पन्न हुई। शेख अब्दुल्ला की मृत्यु के पश्चात, उनके पुत्र फारुख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने; परंतु, इंदिरा गांधी ने उन्हें हटा दिया था। लेकिन राजीव गांधी के साथ, कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने मिलकर 1986 में जम्मू-कश्मीर में गठबंधन कार्यवाहक सरकार बनाई।

 

1987 में जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराए गए। मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (एमयूएफ), कश्मीरियों के एक समूह, जो केंद्र से अधिक स्वायतत्ता चाहते थे, द्वारा गठित एक पार्टी भी चुनाव मैदान में थी। चुनावों में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस को मत देने का व्यापक प्रचार किया गया, ताकि चुनाव के नतीजे बड़ी मात्रा में उनके पक्ष में आएं। निष्पक्ष एवं स्वतंत्र चुनावों में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस गठजोड़ शायद जीत गया होता, लेकिन गलत तरीकों एवं गड़बड़ियों ने निराशा का माहौल उत्पन्न किया और भारत सरकार के प्रति गुस्सा एवं अलगाव की भावना ने जोर पकड़ लिया। यह कश्मीर में उग्रवाद की शुरुआत थी, और कुछ कश्मीरी युवा मदद के लिए पाकिस्तान की तरफ झुके।

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