Economic Issues Fuel National Discontent: आर्थिक मामलों ने राष्ट्रीय असंतोष को उग्र बनाया

इन राष्ट्रवादी विद्वानों द्वारा आर्थिक निकास का सिद्धांत प्रस्तुत करने से देश के समक्ष साम्राज्यवादी शासकों की वास्तविक मंशा उजागर हो गई तथा इस धारणा का खोखलापन सार्वजनिक हो गया कि विदेशी शासन, भारत के हित में है। इस प्रकार इस मिथक की नैतिक अवधारणा का पर्दाफाश हो गया। इस सिद्धांत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि भारत निर्धन है, क्योंकि वह उपनिवेशी हितों के अनुरूप शासित किया जा रहा है।
इन विद्वानों का यह आंदोलन, अंग्रेजी शासन को एक प्रकार की चुनौती तथा राष्ट्रीय आंदोलन के उदारवादी काल (1885-1905) में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार था। यह काल राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का शैशवकाल था। 19वीं शताब्दी के अंत तक राष्ट्रवादियों ने यह मांग प्रारंभ कर दी थी कि उन्हें राजनीतिक शक्तियों में हिस्सेदारी तथा कुछ अन्य अधिकार दिये जायें। 20वीं शताब्दी के प्रथम दशक में उन्होंने इंग्लैंड या अन्य राष्ट्रों की तरह स्वशासन की मांग कर दी। इन राष्ट्रवादियों में दादाभाई नौरोजी अग्रगण्य थे।
भारत में उपनिवेशवाद के चरण
भारत में ब्रिटिश शासन का मूलभूत चरित्र लगभग दो शताब्दियों के उसके लंबे इतिहास में एक समान नहीं रहा। विश्व अर्थव्यवस्था में ब्रिटेन की बदलती स्थिति ने ब्रिटिश उपनिवेशवाद की प्रकृति में परिवर्तनों को प्रवृत्त किया। मार्क्सवादी इतिहासकारों, विशिष्ट रूप से रजनी पाम दत्त, ने भारत में साम्राज्यवादी इतिहास में तीन अतिव्यापित चरणों की पहचान की।
प्रथम चरण
व्यापारी पूंजी की कालावधि, जिसे प्रायः मोनोपोली ट्रेड एंड डायरेक्ट एपरोप्रिएशन की अवधि भी कहा गया, (या ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रभुत्व का काल, 1757-1813) दो मूलभूत उद्देश्यों पर आधारित थी: (i) अंग्रेज या यूरोपीय व्यापारियों या व्यापारी कंपनियों और साथ ही साथ भारतीय व्यापारियों के विरुद्ध, भारत के साथ व्यापार का एकाधिकार हासिल करना; और (ii) सत्ता पर नियंत्रण के माध्यम से सरकारी राजस्व पर प्रभुत्व कायम करना।
इस समयावधि के दौरान, प्रशासन, न्यायिक तंत्र, परिवहन एवं संचार, कृषि या औद्योगिक उत्पादन की पद्धतियों, व्यवसाय प्रबंधन या आर्थिक संगठन के स्वरूपों में किसी प्रकार का मूलभूत परिवर्तन नहीं किया गया, और ना ही शिक्षा या बौद्धिक क्षेत्र, सांस्कृतिक या सामाजिक संगठन में कोई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए। वस्तुतः, परम्परागत भारतीय सभ्यता, धर्म, विधि, जाति व्यवस्था, परिवार संरचना, इत्यादि को उपनिवेशवादी शोषण के मार्ग में एक बाधा के रूप में नहीं देखा गया।
केवल निम्न क्षेत्रों में परिवर्तन किए गए:
(i) सैन्य संगठन एवं तकनीकी क्षेत्र में जिसे स्थानीय शासक भी अपनी सैन्य बलों में शामिल कर रहे थे, और
(ii) प्रशासन में उच्च स्तर पर राजस्व संग्रहण की संरचना में, जिससे यह अधिक दक्ष एवं निर्बाध बन सके। इस चरण में, भारत से व्यापक पैमाने पर धन संपदा का ब्रिटेन को निकास हुआ जो उस समय ब्रिटेन की राष्ट्रीय आय का 2-3 प्रतिशत था। यह वह धन था जिसने ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति के वित्तीयन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस चरण में, भारत में ब्रिटिश विनिर्मित वस्तुओं का कोई व्यापक आयात नहीं हुआ बल्कि उल्टे भारतीय कपड़े इत्यादि के निर्यात में वृद्धि हुई। हालांकि, इस चरण में कंपनी के एकाधिकार तथा शोषण से भारतीय बुनकर बर्बाद हो गए थे। उन्हें अनार्थिक बाध्यताओं के तहत कंपनी के लिए काम करने को मजबूर किया गया।
द्वितीय चरण
व्यापार के चलते इसके शोषणकारी रूप में होने के कारण, इस चरण को मुक्त व्यापार का उपनिवेशवाद भी कहा गया। यह 1813 के चार्टर अधिनियम से प्रारंभ कंपनी के आधिपत्य के तुरंत बाद, ब्रिटेन में चर्चा होने लगी कि नवीन उपनिवेश हुआ और 1860 के दशक तक निरंतर जारी रहा। भारत के अधिकतर हिस्सों पर । किसके हितों की पूर्ति करेगा। नवोदित औद्योगिक पूंजीवादी, ईस्ट इंडिया कंपनी और भारत में इसके शोषण को आलोचना करने लगे। वे मांग करने लगे कि में औपनिवेशिक प्रशासन एवं नीति को अब ब्रिटिश पूंजीवादी हितों की पूर्ति करनी चाहिए।
अब, भारत को ब्रिटिश विनिर्मित वस्तुओं विशिष्ट रूप बढ़ते उत्पादन हेतु बाजार के रूप में उपयोग किया जाना था। उसी समय, इंग्लैंड में पूंजीवादियों को भारत के कच्चे माल, विशिष्ट रूप से कपास एवं खाद्यान्न, की आवश्यकता थी। इसके अलावा, भारत केवल तभी अधिक ब्रिटिश वस्तुओं का क्रय कर सकता था, जब वह अधिकाधिक निर्यात करे।
कपड़े के कंपनी एवं ब्रिटिश व्यापारियों के लाभांश को बढ़ाने के लिए कच्चे माल के निर्यात में वृद्धि की गई। इसके अलावा, सेवानिवृत्ति के पश्चात ब्रिटेन लौटने वाले ब्रिटिश अधिकारियों की पेंशन के भुगतान के लिए भी धन की आवश्यकता थी। इस चरण में निम्नलिखित प्रमुख लक्षण परिलक्षित हुएः
(i) भारत की औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था को ब्रिटिश एवं वैश्विक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से एकबद्ध किया गया। यह मुक्त व्यापार शुरू करने से संभव हुआ। भारत में सभी प्रकार के आयात शुल्कों को या तो पूरी तरह समाप्त कर दिया गया या नाममात्र का कर दिया गया।
(ii) ब्रिटिश पूंजीपतियों को भारत में चाय, कॉफी एवं नील का व्यापार करने तथा व्यापार, परिवहन, खनन तथा आधुनिक उद्योग स्थापित करने के लिए मुक्त प्रवेश की भी अनुमति दी गई।
(iii) परम्परागत कृषि संरचना को पूंजीवादी संरचना में तब्दील करने के लिए कृषि में स्थायी बंदोबस्त तथा रैयतवाड़ी पद्धति की शुरुआत की गई।
(iv) गांव एवं सुदूरवर्ती क्षेत्रों को शामिल कर प्रशासन को अधिक व्यापक बनाया गया। इन परिवर्तनों से ब्रिटिश विनिर्मित वस्तुएं गांवों एवं सुदूरतम क्षेत्रों तक पहुंच बना सकी और वहां से कृषि उत्पाद प्राप्त करना संभव हो सका।
(v) वैयक्तिक विधियों को लगभग अपरिवर्तित रखा गया जैसाकि इसने अर्थव्यवस्था के औपनिवेशिक रूपांतरण को प्रभावित नहीं किया। हालांकि, आपराधिक विधि, संविदा विधि एवं वैधानिक प्रक्रियाओं से संबद्ध परिवर्तनों ने पूंजीवादी वाणिज्यिक संबंधों तथा कानून-व्यवस्था को बढ़ावा दिया।
(vi) व्यापक रूप से विस्तारित प्रशासन को सस्ता श्रमबल / मानव संसाधन प्रदान करने के लिए आधुनिक शिक्षा को लाया गया। हालांकि दो कारणों- (क) परिवर्तन एवं विकास के समग्र वातावरण को उत्पन्न करने; और (ख) शासक के प्रति निष्ठा की संस्कृति को जन्म देने से भारत की समाज एवं संस्कृति को रूपांतरित करने का लक्ष्य भी रखा गया था।
(vii) आर्थिक रूपांतरण एवं खर्चीले प्रशासन (नागरिक एवं सैन्य दोनों) के कारण किसानों पर करों के भार में अत्यधिक वृद्धि हुई। (viii) भारत ने ब्रिटिश निर्यात का 10-12 प्रतिशत तथा कपड़ा नियति का लगभग 20 प्रतिशत का अवशोषण किया। 1850 के बाद, अन्य रेल संबंधी सामान बड़े पैमाने पर भारत में आयात किया गया। (ix) एशिया एवं अफ्रीका में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विस्तार के लिए भारतीय सेना का इस्तेमाल किया गया।
तृतीय चरण
तृतीय चरण को प्राय: उपनिवेशों के लिए विदेशी निवेश एवं अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा रूप में विवेचित किया गया है। विश्व अर्थव्यवस्था में विभिन्न परिवर्तनों के चलते 1860 के दशक में इसकी शुरुआत हुई। ये बदलाव निम्न प्रकार थे: (i) यूरोप के विभिन्न देशों, संयुक्त राज्य अमेरिका तथा जापान द्वारा ब्रिटेन की औद्योगिक सर्वोच्चता को चुनौती दी गई। (ii) उद्योग में वैज्ञानिक ज्ञान के अनुप्रयोग के परिणामस्वरूप, औद्योगिकीकरण की गति में बेहद तेजी आई।
(iii) अंतरराष्ट्रीय परिवहन में क्रांति के कारण वैश्विक बाजार एकबद्ध हो गया। इस चरण के दौरान, भारत पर अपने नियंत्रण को समेकित करने हेतु ब्रिटेन ने कठोर प्रयास किए। उदारवादी साम्राज्यवादी नीतियों को प्रतिक्रियावादी साम्राज्यवादी नीति से प्रतिस्थापित कर दिया गया, जो वायसराय लिटन, डफरिन, लैंसडाउन और कर्जन के शासनकाल के दौरान प्रतिबिम्बित हुईं। भारत पर औपनिवेशिक शासन के सुदृढ़ीकरण से ब्रिटेन अपने प्रतिद्वंदियों को बाहर और अधिकाधिक ब्रिटिश पूंजी को भारत में आकर्षित कर इसे सुरक्षित रख सकता था।
परिणामस्वरूप, भारत में रेलवे, ऋण (भारत सरकार को), व्यापार, कोयला खनन, जूट मिल्स, जहाजरानी एवं बैंकिंग में बड़े पैमाने पर ब्रिटिश पूंजी निवेश किया गया।
भारतीयों को स्वशासन हेतु प्रशिक्षित करने का विचार समाप्त हो गया। अब ब्रिटिश शासन का अंतिम उद्देश्य भारतीयों पर ब्रिटिश प्रभुत्व को एक स्थायी संरक्षक के रूप में घोषित करना था। भारतीयों को स्थायी रूप से अपरिपक्व घोषित किया जाना था जिसे ब्रिटिश नियंत्रण एवं संरक्षण की आवश्यकता थी। भूगोल, जलवायु, जाति, नस्ल, इतिहास, संस्कृति, और सामाजिक संगठन इन सभी को पर दिखाया जाना था। इस प्रकार, ब्रिटिश भारतीयों पर अपने शासन को “गोरे लोगों पर भार/दायित्व” तथा बर्बर लोगों को सभ्य बनाने के नाम पर सदियों तक न्यायसंगत दिखाना चाहता था।