Ghandi Ji And Ambdker:गांधी जी तथा अंबेडकर के मध्य वैचारिक भिन्नता और समानता

Ghandi Ji And Ambdker:गांधी जी तथा अंबेडकर के मध्य वैचारिक भिन्नता और समानता

आंबेडकर जयंती विशेष: बाबा साहब व महात्मा गांधी के बीच क्यों थी असहमति ?

गांधी जी तथा अंबेडकर के मध्य वैचारिक भिन्नता और समानता महात्मा गांधी, स्वतंत्रता संघर्ष के प्रमुख उन्नायक और संरचनाकार, तथा डॉ. बी.आर. अंबेडकर, स्वतंत्र भारत के प्रमुख संविधान निर्माता, कई मामलों में समान विचार रखते थे; लेकिन सामाजिक सुधार के तरीकों तथा राजनीतिक स्वतंत्रता को लेकर उनमें गहरे मतभेद भी थे। गांधी जी की योजना बेहद व्यापक थी। उन्होंने राजनीतिक स्वतंत्रता को अलग करके सामाजिक सुधार की अनुमति नहीं दी।

 

गांधी जी ने विदेशी कपड़े जलाए और अंबेडकर ने मनुस्मृति जलाई, इसलिए नहीं कि ये दोनों भावनात्मक कृत्य थे, अपितु ये भारतीयों की दासता एवं बंधन के प्रतीक थे। गांधी जी विश्वास करते थे कि स्वतंत्रता कभी भी प्रदान नहीं की जाती, अपितु यह उस सत्ता में निहित होती है, जो इसकी मांग करती है और इसका प्रयोग करने की चाह रखती है, जबकि अंबेडकर का मानना था कि स्वतंत्रता शासकों द्वारा प्रदान की जाती है।

 

 इसी प्रकार, लोकतंत्र की प्रकृति एवं क्षेत्र पर दोनों के विचारों में भिन्नता है।

अबेडकर स्वतंत्र भारत के लिए संसदीय व्यवस्था चाहते थे, जबकि गांधी जी संसदीय व्यवस्था के प्रति अधिक सकारात्मक रुख नहीं रखते थे। गांधी जी का मानना था कि नेतृत्व द्वारा प्रभुत्व की प्रवृत्ति के साथ लोकतंत्र भीड़तंत्र में परिवर्तित हो जाता है, दूसरी ओर, अंबेडकर इस संभावना से बेपरवाह थे, अपितु उन्होंने भीड़तंत्र के लिए लोगों में इच्छा जागृत की, जहां वंचित या दलितों के उन्नयन द्वारा सरकार पर दबाव बनाया जा सकता है।

 

गांधी जी एवं अंबेडकर दोनों राजनीतिक तथा सामाजिक कार्यकर्ता थे। अंबेडकर की कार्यगत पद्धति बेहद कठोर थीं, लेकिन अहिंसा को लेकर समझौता विहीन तरीके के अलावा गांधी जी में वैचारिक या सैद्धांतिक कठोरता नहीं थी। गांधी बी 20वीं शताब्दी की राजनीतिक विचारधाराओं (उदारवाद, साम्यवाद और फासीवाद) से स्पष्ट रूप से आगे बढ़े और वे इन जटिल संरचनाओं, जिन्होंने व्यक्ति को किंकर्तव्यविमूढ़ बना दिया, के सरल व्यावहारिक विकल्पों के साथ शुरुआत करना चाहते थे।

 

दूसरी ओर, अंबेडकर का उदारवादी विचारधारा और सहायक संस्थागत ढांचे के प्रति काफी झुकाव था। अंबेडकर का प्रबल जातिगत पहचान के प्रति भी लगाव था। अंबेडकर की राजनीति में भारतीय भिन्नता एवं खंडता के पहलू उजागर होते हैं, दिया। ‘हिंद स्वराज’ में गांधी जी ने सिद्ध किया कि साम्राज्यवादी शासन से पूर्व जबकि गांधी जी की राजनीति में भारतीय एकता एवं अखंडता का पहलू दिखाई।

 

अंबेडकर का विचार था

कि भारतीय एकता औपनिवेशिक राज्य द्वारा लागू भारत एक राष्ट्र रहा; और ये अंग्रेज थे, जिन्होंने भारत की सांस्कृतिक एकता को ब्रिटिश विधिक व्यवस्था का आनुषंगिक परिणाम थी।

  • गांधी जी की दृष्टि में ‘ग्रामराज, रामराज्य है’ और एक सच्ची स्वतंत्रता है, लेकिन अंबेडकर के विचार इसके विपरीत थे। उनका मानना था कि भारतीय ग्रामों की यथास्थिति की प्रकृति ने समानता और बंधुत्व तथा स्वतंत्रता को भी नकारा है। इसलिए उनके अनुसार, हमें भारतीय ग्राम व्यवस्था पर अभिमान करने की अपेक्षा शर्म आनी चाहिए।

 

अंबेडकर ने सामाजिक एकीकरण और सुधार के लिए बल प्रयोग करना या बलपूर्वक बाध्य करने का जोरदार खंडन किया। परिवर्तन, सुधार एवं एकीकरण उचित शिक्षा के माध्यम से हो सकता है, इस पर गांधी जी एवं अंबेडकर दोनों एकमत थे।

 

दलितों या वंचितों के उत्थान के तरीके

एवं माध्यम पर दोनों में गहरा अंतर्विरोध था। दलितों या अछूतों को गांधी जी द्वारा ‘हरिजन’ नाम देना अंबेडकर को पसंद नहीं आया; वे इसे गांधी जी की चालाकी मानते थे। जब गांधी जी ने ऑल इंडिया एंटी-अनटचेबिलिटी लीग का नाम बदलकर हरिजन सेवक संघ किया, तो अंबेडकर ने इसका विरोध किया, और यह कहते हुए उन्होंने इस संगठन को छोड़ दिया कि गांधी जी के लिए अस्पृश्यता मात्र एक मंच है न कि एक सजग कार्यक्रम।

गांधी जी से भिन्नता रखते हुए, अंबेडकर का मानना था कि धर्म का केंद्र मनुष्यों के बीच होना चाहिए, न कि मनुष्य एवं भगवान के बीच, जैसा गांधी जी का मानना था। गांधी जी भी अंबेडकर की भांति हिंदुत्व से बुराइयों को समाप्त करना चाहते थे, लेकिन वे इन्हें पूरी तरह समाप्त न करके, इनमें सुधार एवं इन्हेंपुनर्निर्मित करना चाहते थे। राजनीति में अंबेडकर की अवधारणाएं थीं- धर्म की स्वतंत्रता, निर्बाध नागरिकता और राज्य एवं धर्म की पृथकता। गांधी जी ने भी धर्म की स्वतंत्रता का | विचार दिया, लेकिन वे राजनीति एवं धर्म को पृथक करने के पक्षधर नहीं थे |

 

गांधी एवं अंबेडकर दोनों ने ही यह स्वीकार किया

कि धर्म सामाजिक परिवर्तन के एजेंट की भांति है। नि:संदेह,अनुसार,के प्रभुसत्ता लोगों में निहित होती है और वे राज्य की अंबेडकर सौमित होती है, अन्यथा यह व्यक्ति के व्यक्तित्व एवं इच्छा को समूल मिटा देगी। सौमित प्रभुसत्ता में विश्वास करते हैं। गांधी जी के अनुसार भी राज्य की प्रभुसता हिंसा एवं अहिंसा को लेकर गांधी जी एवं अंबेडकर में मतभिन्नता थी। अंबेडकर गांधी जी ऐसा नहीं मानते थे, और किसी भी प्रकार की हिंसा के घोर विरोधी थे।

का मानना था कि पूर्ण अहिंसा साध्य है और सापेक्षिक हिंसा एक साधन है, जबकि के मशीनीकरण और भारी मशीनों के उपयोग पर भी गांधी जी एवं अंबेडकर में मत भिन्नता थी। गांधी जी मशीनीकरण के विनाशकारी विमानवीकरण प्रभाव के आलोचक थे; और इसके लिए उन्होंने शोषणकारी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया। अंबेडकर ने निजी संपत्ति बनाने वाले गलत सामाजिक संगठनों को लेकर मशीनीकरण के बुरे प्रभाव को दिखाया।

उनके मशीन एवं आधुनिक सभ्यता सभी के लाभ के लिए थी, और उन्होंने कहा कि “लोकतांत्रिक समाज का नारा मशीन और अधिक मशीनीकरण, सभ्यता और अधिक सभ्यता होना चाहिए।” अंबेडकर मानव जीवन के समग्र पहलुओं को महत्व देते थे। जीवन के आध्यात्मिक एवं भौतिक पहलुओं के बीच संतुलन उनकी मुख्य चिंता थी। गांधी जी की पंचायत व्यवस्था भी व्यक्ति के समग्र पहलू पर बल देती है।

गांधी जी, अंबेडकर के वेदों एवं ग्रंथों को छोड़ने के आह्वान

से सहमत नहीं थेउनका मानना था कि जाति धार्मिक सीमा क्षेत्र और आध्यात्मिकता के साथ कुछ हैं नहीं कर सकती। जाति और वर्ण अलग-अलग हैं और जाति विकृत विकार है। अंबेडकर अछूतों को हिंदू समुदाय के बाहर एक ‘धार्मिक अल्पसंख्यक’ मानते थे, जबकि गांधी जी उन्हें हिंदू समुदाय का अभिन्न अंग मानते थे। अंबेडकर ने अछूतों को ‘राजनीतिक अल्पसंख्यक या ‘बलपूर्वक बनाए गए अल्पसंख्यक’ कहना उचित समझा।

गांधी जी के अनुसार, अस्पृश्यता भारतीय समाज की विभिन्न समस्याओं में से एक है, लेकिन अंबेडकर के लिए यह एकमात्र समस्या थी, जिसने उनका समग्र ध्यान आकर्षित किया। अंबेडकर ने ऐतिहासिक दृष्टिकोण से इस समस्या के रूप में अधिक लिया और इसके उन्मूलन के लिए व्यावहारिक समाधान। का समग्र एवं व्यापक अध्ययन किया और गांधी जी ने इसे समकालीन स्थिति प्रस्तुत करने का प्रयास किया।

इस प्रकार, गांधी जी एवं अंबेडकर के विचारों में भिन्नता है,

तो समानता भी है। पृष्ठभूमि, शिक्षा एवं अनुभव इत्यादि के कारण हो सकती है। अंबेडकर ने मानव विरोध है, तो सहमति भी है। दोनों के मध्य दृष्टिकोण की भिन्नता अवधारणा, गरिमा के साथ गांधीवादी नजरिए को साझा किया। कानून बनाने एवं तोड़ने के लिए असहयोग, हड़ताल, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा इत्यादि गांधीवाद की श्रेष्ठ बाह्य अभिव्यक्तियां थीं। लेकिन अंबेडकर राजनीतिक प्रक्रिया में संवैधानिक एवं कानूनी समीक्षा की तरफ अधिक झुके हुए प्रतीत होते हैं।

 

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