Babri Masjid Ka Vidvansh: बाबरी मस्जिद विध्वंस
1980 के दशक के उत्तरार्द्ध में, भारतीय जनता पार्टी ने 1991 के चुनावों में लाभ हासिल करने के लिए राम जन्म भूमि का मुद्दा उठाया। विश्व हिंदू परिषद् भी मामले को लेकर बेहद आक्रामक थी, और इसने बाबरी मस्जिद के स्थान पर मंदिर बनाने की मांग को लेकर अयोध्या एवं देश के अन्य भागों में विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिए। स्पष्ट था कि विवादास्पद स्थल पर कुछ विध्वंस और निर्माण उसने स्वयं पहले भी किया था, लेकिन प्रशासन ने इस पर ध्यान नहीं दिया।
उत्तर प्रदेश में उस समय बीजेपी का शासन था और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे। विश्व हिंदू परिषद् ने घोषणा की कि 6 दिसंबर, 1992 को राम मंदिर का निर्माण कार्य शुरू होगा। हजारों स्वयंसेवक – कार सेवक- अयोध्या में एकत्रित हो गए। घोषणा में बताया गया था कि मस्जिद के निकट मंच पर प्रार्थना की जाएगी, लेकिन वह दिन आया, तो कार सेवकों के समूह ने मस्जिद की तरफ बढ़ना शुरू कर दिया l
जबकि आरएसएस और पुलिस ने इसके लिए मना किया था। भीड़ अनियंत्रित हो गई, जिसकी इच्छा मस्जिद का विध्वंस करने की थी। उनके पास लोहे की छड़ें और अन्य हथियार थे, तथा जल्द ही उन्होंने मस्जिद की दीवारों पर चढ़ना शुरू कर दिया। एल.के. आडवाणी जैसे बड़े नेता वहां इकट्ठे हो गए और कार सेवकों को वापस आने को कहा, लेकिन कोई फायदा नहीं
हुआ। पुलिस ने हालात को नियंत्रित करने का ज्यादा प्रयास नहीं किया। मस्जिदपर हमला किया गया और इसे मलबे के ढेर में बदल दिया गया। बीजेपी ने स्पष्टीकरण दिया कि यह पार्टी का काम नहीं था, और यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। देश के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण से भी अधिक था। यह एक त्रासदी और अपशगुनथा, जिसके दीर्घावधिक दुष्परिणाम होने वाले थे।
उत्तर प्रदेश में और देश के कई अन्य भागों में सांप्रदायिक दंगे भड़काने के लिए कई बीजेपी नेताओं को गिरफ्तार किया गया, जिसमें कई लोग मारे गए थे। शिव सेना द्वारा दंगे एवं हिंसा भड़काने के कारण बॉम्बे भी सर्वाधिक पीड़ित जगहों में से एक था। 1993 में, बॉम्बे में स्थित माफिया डॉन ने शहर (बॉम्बे) के मुख्य स्थानों पर, मुस्लिमों पर पूर्व में हुए हमलों के प्रतिशोध स्वरूप, बम धमाके कराए। वस्तुत: हालत को बद्तर होने से रोकने के लिए कल्याण सिंह ने कुछ नहीं किया।
Babri Masjid Ka Vidvansh
मुख्यमंत्री के रूप में उनका यह कर्तव्य था कि वे कानून-व्यवस्था को दुरुस्त रखते। कई लोग इस बात से अचंभित थे कि ऐसी स्थिति में केंद्र भी ही, अस्थिरता एवं कोलाहल की अग्रिम संभावनाओं के चलते राष्ट्रपति शासन निष्क्रिय बना रहा, जिसके लिए उसकी आलोचना की जाती रही थी। निश्चित को सख्त आदेश दिए जाने चाहिए थे।
संभवतः प्रधानमंत्री स्वयं और उनकी लगाया जाना चाहिए था, और स्थिति को काबू में करने के लिए केंद्रीय बलों विध्वंस की घटना हो जाने के बाद ही उत्तर प्रदेश में सरकार को बर्खास्त करके पार्टी सख्त कदम उठाकर हिंदू विरोधी होने का जोखिम नहीं उठा सकती थी। राष्ट्रपति शासन लगाया गया। इस घटना, और इसके परिणामस्वरूप घटित दंगों के कारण पूरी दुनिया में
गए कि भारत अप्रभावी सरकार सहित कानूनविहीन देशों में से एक देश बन
की छवि धूमिल हुई। इतनी हृदयविदारक घटना घटित होने पर यह कयास लगाए
गया था या कुछ हद तक तानाशाह प्रकार का हो चुका था। यह अनुमान सच
- साबित नहीं हुए। लेकिन बाबरी मस्जिद विध्वंस ने आधुनिक भारत के इतिहास
में एक कलंक लगा दिया था, जिसकी अनुगूंज कई वर्षों तक सुनाई दी। समाज
में, जहां हिंदू-मुस्लिम के बीच अभी तक कोई प्रत्यक्ष टकराव नहीं हो रहा था,
यद्यपि दोनों समुदाय पीड़ित होने का दश महसूस कर रहे थे और सांप्रदायिक दंगे
हो रहे थे, अब खुले तौर पर दोनों समुदायों के बीच वैमनस्य और शक दिखाई
देने लगा। यह कहना सही नहीं होगा कि प्रत्येक मुस्लिम और हिंदू ऐसी भावना
से ग्रसित था, लेकिन उस घटना का एक सामान्य प्रभाव परिलक्षित हो चुका था।
Mugal Samrajya ke wighatan ke Karan: मुगल साम्राज्य के विघटन के कारण
लिब्रहान आयोगः
बाबरी मस्जिद विध्वंस के 10 दिन बाद, गृह मंत्रालय के
आदेश पर एक आयोग गठित किया गया। जस्टिस लिब्रहान इस आयोग
एकमात्र सदस्य थे, जो पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में कार्यरत न्यायाधीश
थे। इस आयोग को 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में ढहाए गए बाबरी मस्जिद
के विवादित ढांचे और उसके बाद फैले दंगों की जांच का काम सौंपा गया
था। आयोग को अपनी रिपोर्ट तीन माह के भीतर पेश करनी थी, लेकिन इसका
कार्यकाल अड़तालीस बार बढ़ाया गया और 17 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद
अंततः आयोग ने 30 जून, 2009 को अपनी रिपोर्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन
सिंह को सौंपी।
Babri Masjid Ka Vidvansh
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में जिन 68 लोगों को दोषी ठहराया था, उनमें पूर्व
प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, वरिष्ठ नेता एल.के. आडवाणी, उत्तर प्रदेश के
तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, शिव सेना के तत्कालीन अध्यक्ष बाल ठाकरे, विश्व
हिंदू परिषद् के अशोक सिंघल, आरएसएस के पूर्व सरसंघ चालक के.एस. सुदर्शन
के.एन. गोविंदाचार्य, विनय कटियार, उमा भारती, साध्वी ऋतम्भरा, प्रवीण तोगड़िया
इत्यादि के नाम शामिल थे।
इस रिपोर्ट में तत्कालीन मुख्यमंत्री (उत्तर प्रदेश के) कल्याण सिंह को घटना का दर्शक बताते हुए आयोग ने तीखी टिप्पणी की थी। आयोग का कहना था कि कल्याण सिंह ने इस घटना को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया, उ आरएसएस को अतिरिक्त संवैधानिक अधिकार दे दिए।