हरित क्रांति और श्वेत क्रांति का बीजारोपण

भारत उस समय भोजन की कमी से जूझ रहा था और स्थितियां बेहद विकट थीं, जब शास्त्री जी ने सी. सुब्रमण्यम को खाद्य एवं कृषि मंत्री के तौर पर अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया। शास्त्री जी ने हरित क्रांति की नींव डालने में अपने मंत्रियों का पूरा सहयोग किया, यद्यपि इसका पूरा श्रेय इंदिरा गांधी को दिया जाता है, जैसाकि इसका प्रभाव एक दशक बाद दृष्टिगोचर हुआ। लेकिन वास्तव में, शास्त्री जी की भारतीय कृषि को रूपांतरित करने की पहल का परिणाम था।
हरित क्रांति में तीन क्षेत्रों- प्रौद्योगिकीय, आर्थिक और संगठनात्मक पर बल देना शामिल था। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) का पुनर्गठन किया गया, और पहली बार एक वैज्ञानिक, डॉ. बी. पी. पाल को इसका प्रमुख नियुक्त किया गया। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के एम. एस. स्वामीनाथन द्वारा मेक्सिको में नॉर्मन बोरलॉग की टीम द्वारा विकसित किए गए उच्च पैदावार वाली गेहूं की किस्मों को भारत सरकार से अवगत कराया गया, और बताया गया कि भारत कोकिस प्रकार अपरिहार्य रूप से इसका खेतों में परीक्षण करना चाहिए।
चौतरफाविरोध के बावजूद,
जिसमें कांग्रेस पार्टी भी शामिल थी, शास्त्री जी ने 1965 में 250 टन गेहूं के बीज आयात करने की अनुमति दी। बाद में 1966 में कई हजार टन गेहूं के बीज और आयात किए गए। जैसाकि भारतीय वैज्ञानिकों ने इन किस्मों में सुधार किया। नवंबर 1965 में, जब सी.एस. सुब्रमण्यम और ओरविले फ्रीमैन, अमेरिकी कृषि सचिव, रोम में मिले, उन्होंने एक समझौता किया।
समझौते के अनुसार, भारत कृषि, सिंचाई, अनुसंधान, बीज, उर्वरकों में अधिक निवेश और उचित आर्थिक एवं विपणन नीतियों को लागू करके 1971 तक खाद्यान्न के आयात को समाप्त करने हेतु प्रतिबद्ध था। अमेरिका, अपनी तरफ से भारत को 1965 और 1966 में अधिक गेहूं भेजने पर सहमत हो गया।
नवीन प्रौद्योगिकी को सहयोग करने के अभिप्रेरण पर भी काम किया गया। कृषि मूल्य आयोग (एपीसी) और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) जनवरी 1965 में अस्तित्व में आए। राष्ट्रीय बीज निगम और केंद्रीय भंडार निगम भी इसी समय में गठित किए गए। शास्त्री जी श्वेत क्रांति को गति देने वाले कारक भी थे। दूध का उत्पादन और आपूर्ति बढ़ाने के लिए एक राष्ट्रीय अभियान शुरू किया गया।
अक्टूबर 1964 में कंजारी में अमूल की कैटल फीड फैक्टरी का उद्घाटन करने के लिए गुजरात के आणंद में अपने दौरे के समय वह दूध सहकारिता (मिल्क को-ऑपरेटिव) से प्रभावित हुए। उन्होंने इच्छा जाहिर की कि वर्गीज कुरियन, जो उस समय कैरा जिले के को-ऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर यूनियन लिमिटेड (अमूल) के जनरल मैनेजर थे l
ऐसे ही को-ऑपरेटिव को देश के अन्य भागों में शुरू करने में मदद करेंगे ताकि किसानों की स्थिति में सुधार किया जा सके। परिणामस्वरूप, 1965 में आणंद में नेशनल डेयरी डेवेलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) की स्थापना की गई।