भारत के पड़ोसी देशों से संबंध
( भारत एवं पाकिस्तान )

भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध सदैव ही कटु रहे हैं, और इसका कारण पाकिस्तान और भारत के विभाजन के तरीके में निहित है। 1947 के विभाजन से दोनों ही देशों के सम्मुख कुछ नई समस्याएं खड़ी हो गई। दोनों देश अस्त्रों की होड़ में लग गए, जिसके परिणामस्वरूप भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ। इस कारण दोनों देशों के विकास में बाधा खड़ी हुई।
आरंभ से ही पाकिस्तान सभी क्षेत्रों में भारत की बराबरी करने की कोशिश कर रहा था। उसकी दूसरी समस्या अपनी अलग पहचान बनाने की भी थी। पाकिस्तान की प्रतिरक्षा की दृष्टि में भारत का आकार, जनसंख्या, संसाधन और कार्यक्षमताएं गंभीर चुनौती बने हुए। इसका परिणाम यह हुआ कि पाकिस्तान अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने में विशेष रूप से संलग्न रहा। इस उद्देश्य से उसने विश्व के अनेक देशों से सैनिक सहायता मांगी। पाकिस्तान पश्चिमी गुट में शामिल हो गया और इस प्रकार वह भी शीत युद्ध का भागीदार बन गया। भारत ने भी प्रतिरक्षा के लिए अपनी सैन्य शक्ति को सुदृढ़ किया। हालांकि, भारत ने सदैव एक साथ बैठकर विभिन्न मुद्दों का समाधान निकालने की वकालत की।
कश्मीर मामला:
कश्मीर, भारत और पाकिस्तान के बीच एक अहम मुद्दा बना रहा। भारत ने 26 अक्टूबर, 1947 को कश्मीर को अपना हिस्सा बना लिया, लेकिन पाकिस्तान इसे मानने के लिए तैयार नहीं था और उसने जनजातीय कबीलों की आड़ में छुपकर कश्मीर पर आक्रमण किया। भारत ने पाकिस्तानी आक्रमणकारियों को कश्मीर से खदेड़ दिया। इसमें शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में जन-समुदाय ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत ने इस काम को पूरा किए बगैर संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में शिकायत दर्ज कर दी।
यह जनवरी 1948 में दर्ज किया गया, फलत: 1 जनवरी, 1949 को युद्धविराम की घोषणा की गई। 1947 में, भारत ने अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के अंतर्गत कश्मीर में जनमत संग्रह कराने का प्रस्ताव रखा, लेकिन 1955 में कुछ बदली हुई परिस्थितियों के कारण इसे वापस ले लिया गया। हालांकि, कश्मीर के मामले पर संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक लड़ाई चलती रही, लेकिन युद्ध की स्थिति 1964 तक नहीं आई। लेकिन कश्मीर की समस्या का कोई समाधान नहीं निकला और दोनों देशों के संबंधों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। वस्तुतः अब दोनों देश अपनी सीमा की रक्षा करने को तत्पर हो गए और इनमें से कोई भी बलपूर्वक इसे बदलने की इच्छा व्यक्त नहीं करता।
सिंधु नदी जल विवाद:
विभाजन ने अनेक समस्याएं उत्पन्न की, जिनमें सेहै- सिंधु नदी जल बंटवारा। दोनों देश, सिंधु और उसकी सहायक नदियों के ज का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करना चाहते थे। भारत और पाकिस्तान खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना चाहते थे, अतः वे सिंधु के जल का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहते थे। विभाजन के बाद, सिंधु नदी से सिंचित होने वाले 2000 लाख एकड़ क्षेत्र में से 50 लाख एकड़ भूमि भारत के पास रह गई। अधिकांश पश्चिमी नदियां समुद्र में मिल जाती थीं, जबकि पाकिस्तानी नहरें पूर्वी नदिय पर आश्रित थीं। इन नदियों का पानी पूर्वी पंजाब से होकर पाकिस्तान में जन था।
भारत का कृषि विकास भी रावी, व्यास और सतलुज जैसी पूर्वी नदियों के जल पर आश्रित था। पाकिस्तान की नहरों का वह भाग, जो नदी से जुड़ा था भारतीय भू-भाग में पड़ता था। तनाव का कारण यही था। पाकिस्तान में बाढ़ आम या अकाल पड़ने पर पाकिस्तानी शासक भारत को दोषी ठहराते थे। उन्होंने पार्टी की समस्या के लिए भारत को दोषी ठहराया, और न्यायसंगत बंटवारे की मांग की। दूसरी ओर, भारत इस समस्या को सुलझाने के लिए तत्पर था। विश्व बैंक की देख-रेख में 17 अप्रैल, 1959 को वाशिंगटन में नहर के जल के बंटवारे में संबंधित अंतरिम समझौता हुआ। इसके बाद दोनों देशों के बीच व्यापक समझौतों का एक सिलसिला चला। 19 सितंबर, 1960 को कराची में नहर जलसंधि पर हस्ताक्षर किए गए।
भारत और चीन
स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत भारत ने सबसे पहले चीन की च्यांग काई शेक के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सरकार के साथ अपने राजनयिक संबंध स्थापित किये। 1 अक्टूबर, 1949 को चीन में स्थापित माओत्से तुंग की साम्यवादी सरकार को भारत ने दिसंबर 1949 में अपनी मान्यता दे दी, तथा उसे संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता दिलाने हेतु भरपूर समर्थन दिया। इस प्रकार, आजादी के बाद से ही भारत में चीन के प्रति मित्रतापूर्ण संबंधों का निर्वहन किया, किंतु इसके परिणाम भारत के लिए घोर निराशाजनक साबित हुए। भारत-चीन के बीच उत्पन्न तनावों को समझने के लिए तिब्बत में चीन की गतिविधियों, सीमा विवादों तथा चीनी आक्रमण से जुड़े विभिन्न पहलुओं को जानना आवश्यक है।
तिब्बत विवाद एवं पंचशीलः अक्टूबर 1950 में चीन की जनमुक्ति सेना ने तिब्बत पर आक्रमण कर उसे अपने अधीन कर लिया। तिब्बत, भारत एवं चीन के मध्य एक ‘बफर राज्य’ के रूप में स्थापित था। तिब्बत क्षेत्र में 2,000 की सीमा पर ब्रिटिश शासनकाल से ही भारत को नियंत्रण का अधिकार प्राप्त था। चीन की इस आक्रामक कार्रवाई से विचलित होने के बावजूद उसके साथ मित्रतापूर्ण संबंध कायम रखने का निर्णय किया, और 1954 में चीन के साथ संधि करके तिब्बत पर उसके अधिकार को मान्यता दे दी। इस संधि में भारत एवं चीन के आपसी संबंधों के निर्देशक के रूप में पंचशील सिद्धांतों को शामिल किया गया।
उक्त संधि के तहत भारत ने चीन को दिल्ली, कलकत्ता और कलिंगपोंग में अपने वाणिज्यिक अभिकरण स्थापित करने की सुविधा प्रदान की, जबकि चीन ने भारत को तिब्बत में अपना व्यापार केंद्र स्थापित करने की छूट दी। चीन द्वारा सुनियोजित ढंग से तिब्बत की स्वायत्तता कम करते जाने के प्रयासों के परिणामस्वरूप मार्च 1959 में, तिब्बत में एक जन-विद्रोह भड़क उठा। चीन ने इस विद्रोह को दमनपूर्ण उपायों द्वारा कुचल दिया, जिसका भारतीय जनता द्वारा गंभीर विरोध किया गया। भारत द्वारा तिब्बती अनुयायियों को राजनैतिक शरण प्रदान की गई, किंतु धर्मगुरु तिब्बत दलाई लामा तथा उनके भारत सरकार सरकार को कोई मान्यता नहीं दी।
फिर भी, चीन द्वारा खुले रूप से भारत को तिब्बत में विद्रोह भड़काने का जिम्मेदार ठहराया गया, और 1959 में लोंगजू तथा लद्दाख क्षेत्र में 12,000 वर्ग मील भारतीय क्षेत्र पर कब्जा कर लिया गया। दोनों देशों के मध्य सीमा समस्या पर अनेक विरोधपत्रों, स्मरणपत्रों तथा ज्ञापनों का आदान-प्रदान भी हुआ, जिनमें दोनों देशों द्वारा अपने-अपने दावे पेश किये गये। 1959-62 के मध्य चीन द्वारा निरंतर भारतीय सीमाओं का उल्लंघन करने के बावजूद भारत ने शांतिपूर्ण उपायों द्वारा ही सीमा विवाद को सुलझाने के प्रयास किये। दोनों देशों के अधिकारियों द्वारा कई बार आपसी वार्ताएं की गई। अप्रैल 1960 में चीनी प्रधानमंत्री चाउ – एन-लाई ने भी भारत यात्रा की। किंतु समस्या का कोई समाधान नहीं खोजा जा सका।
भारत पर चीनी आक्रमण (1962)
8 सितंबर, 1962 को चीनी सेनाओं ने सोचे-समझे ढंग से उत्तरी-पूर्वी सीमांत एजेंसी (नेफा, आधुनिक अरुणाचल प्रदेश) क्षेत्र में मैकमोहन रेखा का अतिक्रमण किया। 20 अक्टूबर, 1962 को चीन ने लद्दाख से नेफा तक की समूची सीमा पर पूरी तरह आक्रमण कर दिया। चीन के इस गंभीर और जबरदस्त आक्रमण के समक्ष भारतीय सेनाओं को हार का सामना करना पड़ा, और एक बड़े भारतीय भू-भाग पर चीन का आधिपत्य स्थापित हो गया। युद्ध के दौरान भारत को पश्चिमी शक्तियों तथा सोवियत संघ दोनों से सहायता प्राप्त हुई। 21 नवंबर, 1962 को चीन द्वारा नाटकीय ढंग से समूचे सीमा क्षेत्र में युद्धविराम की एकतरफा घोषणा कर दी गई, और वास्तविक नियंत्रण रेखा से 20 किमी. पीछे हटने का ऐलान किया गया। लेकिन इसके बावजूद भी लद्दाख का एक बड़ा भाग तथा सिनक्यांग और दक्षिणी चीन को जोड़ने वाले सामरिक महत्व के क्षेत्र पर चीन का कब्जा जमा रहा।
चीन द्वारा भारत को यह चेतावनी भी दी गई कि यदि भारत पूर्वी क्षेत्र की वास्तविक नियंत्रण रेखा से अथवा मध्य एवं पश्चिमी क्षेत्र की वास्तविक नियंत्रण रेखा से पीछे हटने के राजी नहीं हुआ, तो वह भारत पर पुनः आक्रमण करेगा। इसी मध्य 1962 में छह एफ्रो-एशियाई देशों- इंडोनेशिया, कंबोडिया, संयु के माध्यम से दोनों देशों के मध्य समझौता कराने का प्रयास किया गया। झ अरब गणराज्य, घाना, और सीलोन ( वर्तमान में श्रीलंका) द्वारा ‘कोलंबी प्रस्ताव |
प्रस्ताव में, चीन को पारंपरिक सीमा रेखा से 20 किमी. पीछे हटाने, पूर्वी क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा को दोनों देशों द्वारा युद्धविराम रेखा के रूप में स्वीका करने तथा मध्यक्षेत्र में यथास्थिति कायम रखे जाने का प्रावधान था। भारत ने कोलंबो प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान कर दी, किंतु चीन ने मैकमोहन रेख पर भारतीय सेना की तैनाती और असैनिक घोषित क्षेत्र में नागरिक चौकी स्थापित करने के अधिकार को चुनौती देते हुए उक्त प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया। इस प्रकार भारत-चीन के मध्य संबंधों में गतिरोध बना रहा।
भारत और नेपाल
नेपाल हिमालय के दक्षिणी ढलान और भारत की उत्तरी सीमा के बीच बसा हुआ है। अतः भारतीय सुरक्षा की दृष्टि से नेपाल का सामरिक महत्व है। भारत इस तथ्य को समझ रहा था, अतः जुलाई 1950 में उसने नेपाल के साथ एक संधि की। भारत ने नेपाल की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और स्वतंत्रता को मान्यत दी। यह समझौता हुआ कि दोनों देश किसी भी प्रकार के मन-मुटाव, या किसी समस्या पर हुई गलतफहमी से एक-दूसरे को अवगत कराएंगे।
भारत और भूटान
भूटान हिमालय से घिरा और चीन की सीमा से लगा एक देश है। भूटान सामरिक रूप से भारत से जुड़ा है। अगस्त 1949 में दोनों देशों ने चिरस्थायी शांति और मित्रता के लिए एक संधि की। भारत ने वचन दिया कि वह भूटान के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। दूसरी ओर, भूटान विदेशी संबंधों के लिए भारत के परामर्श पर चलने के लिए तैयार हो गया।
भारत और श्रीलंका
होने वाली किसी भी गतिविधि का भारत की सुरक्षा और शांति पर प्रभाव पड़ता श्रीलंका हिंद महासागर में स्थित है, और भारत का पड़ोसी देश है। श्रीलंका में निरंतर संघर्ष और झगड़े होते हैं। 1958 और उसके बाद हुए सिंहली-तमिल दंगे है। श्रीलंका में मुख्य रूप से सिंहली और तमिल रहते हैं। इन दोनों समुदायों में बेहद गंभीर प्रकृति के थे। भारत, श्रीलंका के जातीय झगड़ों को उनका आंतरिक मामला मानता है। भारत के श्रीलंका से मित्रतापूर्ण संबंध हैं, और दोनों देशों के बीच आर्थिक तथा व्यापारिक संबंध भी कायम हैं। श्रीलंका गुटनिरपेक्ष आंदोलन का समर्थक है। यह किसी सैन्य संगठन का सदस्य नहीं है।